Friday, October 28, 2016

सिलसिला

ज़िन्दगी के अँधेरे में
जब कभी होता हूँ अकेला
यादों के जमे मोम के शमां जलाकर
रौशनी कर लेता हूँ
फिर हरेक यादों के मोम पिघलकर
फिर जम जाते हैं
किसी और शाम को रौशन करने के लिए....    

Tuesday, December 29, 2015

सिक्के के दो पहलू

घने काले बादल सा तेरी नाराज़गी,
सच्चे धूप सा मेरे प्यार की संजीदगी,
और फिर झूम झूम कर
सब कुछ बरस बरस कर,
बरसों से जमे खामोशी अब पिघल गए,
सब बारिश के धार में मिल गए,
अब जा कर सब थम सा गया है,
प्रस्फुटित स्नेह-किसलय नरम सा है!

Monday, August 8, 2011

यथा-स्थिति

वही धूप,
वही पानी,
कोई चन्दन,
तो कोई नीम,
जैसी जिसकी नियति,
वैसी ही उसने पाई...
प्रयास की अपनी सीमा है,
आमूल परिवर्तन की आस मिथ्या है,
जिस शकल में हो,
उसी में प्रसन्न रहो...

गुब्बारों का खेल

वो आया था कई सालों पहले,
कोई था एक सपनों का सौदागर,
कई सारे दे गया था मुझे अरमानों के रंगीन गुब्बारे,
मैं नादान उनसे बहुत खेला,
बहुत बार मेरे निश्चल मन को सबने गुदगुदाया,
फिर कुछ गुब्बारे फुट गए,
और कुछ को लोगों ने मुझसे छीन लिए,
जो कुछ बचे थे वो सारे एक एक कर,
मेरे हाथों से छुट गए और मुझसे बिछड़ते,
दूर आसमान में तेजी से मुझसे और दूर जाते,
मुझसे मानो अलविदा कहता,
और मैं कैसा नादान,
अब उन बादलों और धूप के खेलों में खोया,
बस हाथ में आये और खो गए सारे गुब्बारों के बारे में सोचता,
कभी गर्वित,
कभी व्यथित,
कभी चकित,
सोचता हूँ की आगे की न जाने,
बचपन तो मेरी बहुत रंगीन थी...



मार्गदर्शन

तीव्र चाल,
फिर दौड़,
नया जोश,
ढेर सारी उमंग,
हल्की सी थकान,
पुनः उत्साह,
मंद चाल,
फिर थकान,
ठोकरें,
अवरोध,
प्रयास,
असमर्थता,
क्षणिक विश्राम,
पुनः प्रयास,
विफलता,
अनगिनित प्रयास,
अनगिनत हार,
बढ़ती व्यस्तता,
और साथ साथ व्यग्रता,
बढ़ती जिम्मेदारियों की ठण्ड,
कम होती उम्र की रजाई,
फिर,
सामंजस्य,
स्व-अनुरूप चाल,
एकरसता,
उड़ते अरमानों के बादल के तले,
लम्बी जीवन के पगडंडी पर,
यथार्थ के कड़े धूप को सहते,
नियति के नियंत्रण में,
मैं अब निशब्द,
चला जा रहा हूँ,
किसी अनजाने गंतव्य की ओर...
अनचाही, अनजानी, अनकही, अपराध-बोध से ग्रसित,
कोई अपरिचित सा मार्गदर्शन...

Saturday, October 31, 2009

हौसला

तस्वीर सी बनी,
मेरी जिंदगी पर,
उमर की धूल पड़ गयी है,
धुंधली सी,
कहीं मेरी पहचान,
खोजने से,
कभी दिख पड़ती है,
ऐसा नहीं,
कि कोई छुआ न हो,
ये उँगलियों के निशान कहती है,
मेरे हर अरमानों ने,
गौर से परखा है,
इन को करीब से,
सदियों से रुकी घड़ी सी,
अल्बम में पडी पीली तस्वीरों सी,
यादें ,अब कहीं ठहरे पानी सी,
मानो कैद, सूखने के इंतज़ार में,
गिरते सूखे पत्तों की भी क्या मस्ती है,
पेड़ से जुदा होकर भी देखो,
हवाओं में लहराती,
न जाने कितने उमंग के साथ,
दफ़न हो जाती हैं,
पेड़ सी अब बन गयी है जिंदगी,
हर बसंत में,
नए पत्ते हरी कर देती है,
कितने पतझड़ देख ली है मैंने,
लुटता नही हूँ अब,
बस,
लुटाने का मज़ा लेता हूँ!

Saturday, October 17, 2009

आपस की बात

"ये तो मैंने बहुत पहले सोच लिया था जो तुम आज कह रहे हो। अब तो काफी देर हो गया है, खैर कोशिश कर के देख लो।"
मैं उसकी बातें सुन कर सोचने पर विवश हो गया की जिन्दगी इतनी क्रूर क्यों होती है कि मैं हर बार इतने देर से जागता हूँ? जिधर देखता हूँ हर कोई किसी न किसी मुकाम पर हैं, एक मैं ही छूट सा गया हूँ जैसे। इधर जब मैं किसी और से मुखातिब होता हूँ तो वो कहता है - " मैंने तो ज्यादा सोचा ही नहीं बस सब ख़ुद ही होता चला गया।"
प्रयास और निष्क्रियता के बीच मैंने तो बहुत उछल कूद मारी और हासिल तो बस इतना ही हुआ कि आज मैंने जहाँ से शुरू कि थी उसके आस पास ही खड़ा हूँ।
बजाय इसके कि मैं दूसरो को देखूं, मैं ज्यादा दुखी ख़ुद के क्षमता के अनुरूप अपने सफलता को न देख कर हो जाता हूँ। सफल न होना और असफल होने में ज्यादा फर्क नही है पर बहुत फासला है। मेरे हर प्रयास का फल नाकामी रहा, भाग्य को दोष देना सबसे बड़ी बेवकूफी होगी। मेरे भाग्य अच्छे है तभी मैं इनका आकलन कर पा रहा हूँ। मैंने जीवन में हर तरह के उतर चढाव देखे, पर अपने परिवार के साथ बहुत प्रसन्न रहा हूँ , ये मेरे अच्छे भाग्य नहीं तो और क्या है? मैं जब कभी बहुत ज्यादा फिसलने लगा, कहीं न कहीं मुझे एक सहारा मिल गया। पर अन्दर कहीं एक कसक है कि सभी ने अपनी मंजिल हासिल कि, तो फ़िर मैं क्यूँ छूट गया? बच्चों कि तरह सिर्फ़ शिकायत नहीं पर एक स्ववालोकन का विषय है। मैं नहीं कहता कि मुझे वह होना ही चाहिए था, कुछ न कुछ कारण होंगे, पर आखिर वो पता चले जो मेरे वहां तक पहुँचने में अवरोधक हैं। उम्र के बढ़ने के साथ मेरे आवश्यकताएं और उनकी प्राथमिकताएं बदल रहीं हैं, पर इन बदलावों में स्वयं को ढालने की कोशिश चलती ही रहती हैं। कहीं न कहीं ये डर मन में जरुर समां गया है कि शायद अपने अरमानों के साथ मुझे समझौता करना ही पड़ेगा। अब थक गया हूँ और जरा सा वक्त लगेगा स्वयं को समझाने में कि अब ये ही यथार्थ है। सपने भी कितने अजीब होते हैं, आता है बिना रोक टोक के, जब उनको दफनाना होता है, तो कितना दुःख होता है! सपने शायद अरमानों में अमरबेल कि तरह लिपट गए थे और पेड़ के उन हर शाखाओं को काटना शायद घर में धुप आने देने के लिए अब नितांत आवश्यक हो गया है। दुःख होगा, पर अंधेरे में रहने से ज्यादा अच्छा कुल्हाडी उठाना होगा। यथार्थ के कड़वी घूंट पीने के बाद ही मज़ा देता है। जब तक न पियो सपनों कि बीमारी लगी रहती है, यथार्थ के घूंट औषधि का काम करता है। विकल्पों के तलाश जारी है, जिन विचारों पर पहले कभी ध्यान भी नही दिया करते थी आज उन पर गौर करने के पूर्व फूंक फूंक कर आगे बढ़ना पड़ रहा है। ताने और समीक्षाओं का बाज़ार गरम है, वाजीब है, दुकाने बड़ी बड़ी जब बन गए थे तो उसके होल्डिंग्स उतारते वक्त हर कोई बहुत सारे प्रश्न करेंगे। खामोश रहना निरुत्तर होने का समर्थन करता नज़र आता है, व्याख्या करना अपने अरमानों का गला घोंट यथार्थ से समझौता करता एक मजबूर या आसमान में गूंजता और गरजता युद्ध्पोतक विमान के चक्कर काटते जमीन पर गिरने सा बोध करता है। ख़ुद का सामना करते डर लगता है। मैंने स्वयं के लिए जो एक सपने देखे थे उनसे कोसों दूर पता नहीं किस अनजाने से गलियों में भटकता और अचानक से कहीं एक अजनबी से घर में रहने का सोच लिया है, मानो ऐसा लगता है। बहुत सोचने का समय नही है न ही समीक्षा का वक्त है, जीवन पहले संघर्ष था, अब एक युद्ध सा हो गया है। जरा सी चूक और पराजय ...!
ख़ुद से अब तक घृणा तो नही हुआ है पर देर तक घर पर रहे अतिथि की तरह, अपनापन से फिसलते कड़वाहट का सा बोध हो रहा है। पुराने संकल्प टूटे हैं, पर उनके चिता से नए बने जरुर हैं, बहुत अपमानित सा अनुभव करता हूँ, और हर मेरे आंसुओ से सींचे नए संकल्प मुझे सफल होने के लिए ज्यादा प्रेरित करते रहते हैं।




साथ साथ

देखा है तुम्हें कई बार करीब से, छूकर महसूस भी किया है,
तितलियों जैसे उड़ जाते हो, पकड़ने की जब भी की कोशिश,
ऐसा नहीं कि तुम्हें मैं जानता भी नहीं मेरे अजनबी दोस्त,
साथ बरसों चले हो, तेरे हर आदतों से मैं हो गया हूँ वाकिफ,
मचल जाता था पहले मैं हर उन जुगनुओं को पकड़ने को,
तारों के गलियों में चलते जाने कितने बार गया हूँ अब फिसल,
आदत सी हो गयी है ख़ुद से और खामोशी से बातें करने की,
उकता गया है मन अब नही है कोई और मिलने की ख्वाहिश,
थक गया हूँ अब चलते चलते उठाये इन अरमानों के बोझ को,
बस यहीं कहीं बैठ जाऊं, उम्र तो कर ली मैंने तमाम हासिल।

Sunday, October 11, 2009

यात्रा

पीले पड़ गए हैं अब सारे पत्ते, जिंदगी की धूप काफी कड़ी है,
सुबह के पले मेरे सपने, शाम के अंधेरों में जाने खो गए जैसे,
धीरे धीरे डूबती अंधेरे से नहीं, डूबते सन्नाटे के चीख से डर है,
हर गली अब सूना और रास्ते भी अब उंघती सी नज़र आते हैं,
भटका तो हूँ इसी बस्ती में, हर कोई पहचाना सा नज़र आता है ,
बदले-बदले से हैं तौर तरीके, कोई अब पहचानता भी नही है,
की थी मैंने कोशिश अरमानों के परछाई में रोशनी तलाशने की,
बरसात में भी मैंने कहीं एक आग लगाने की जो गलती की थी,
चुप रहता हूँ, पर एक लम्बी चीख कैद है कहीं अंतर्मन में,
ख़ुद को मैंने बहुत छला है और ख़ुद अपना गुनाहगार भी हूँ।

Saturday, October 10, 2009

मंजिल नहीं रास्ते से प्यार है

अपनों के भीड़ में किसी अजनबी से दोस्ती की है,
खाए हैं इतने चोट की अब जख्मों से प्यार है,
टूटे हैं ख्वाब हर बार मेरे शीशों की तरह,
हकीकत कड़वी ही सही, अब उसी से प्यार है,
पाने की हर कोशिश जब हो गए नाकाम मेरे,
मंजिल नामुमकिन तो अब रास्तों से प्यार है,
हालातों के थपेडों ने कर दिया है मजबूर मुझे,
जो कुछ भी की है हासिल, अब उन्ही से प्यार है,
खुल के कहने की कई बार की मैंने कोशिश,
अब कोई न सुने तो अब खामोशी से ही प्यार है,
पाने को कई बार मचल पड़ा था मन मेरा,
अब आंखों से ओझल, इतनी दूर पर तब भी प्यार है,
हर गम के घूंट पीने के बाद हैं मैंने ये जाना,
तू मिले या न सही, हर कोशिश से मुझे प्यार है।

Sunday, June 14, 2009

ये गर्व भरा मस्तक मेरा

ये गर्व भरा मस्तक मेरा , प्रभु चरण धूल तक झुकने दे
अंहकार विकार भरे मन को , निज नाम की माला जपने दे
मैं मन के मैल को धो न सका , ये जीवन तेरा हो न सका
मैं प्रेमी हूँ इतना न झुका, गिर भी जो पडू तो उठने दे
मैं ज्ञान की बातों में खोया , और कर्महीन पड़ कर सोया
जब आँख खुली तो मन रोया, जब सोये मुझको जगने दे
जैसा हूँ मैं खोटा या खरा, निर्दोष शरण में आ तो गया
एक बार ये कह दे खाली जा या प्रीत की रीत छलकने दे
- हरि ओउम शरण

Thursday, May 21, 2009

गुमशुदा

रास्ते इतने लंबे होते चले गए की उड़ने की कई बार की है मैंने कोशिश,
बादलों के पार कहीं छुपी होगी मेरी मंजिल बारिश का इंतज़ार है अभी,
दिन के उजालों ने मुझे उलझाये रखा अपनी ही परछाइयों में ओझल,
रातों के अंधेरे में चांदनी के नशे में खोकर जुगनुओं को पकड़ने की है चाहत,
दिन भर देखते रहे अपनी ही परछाई को लम्बी होते दूर तक कहीं जाते,
रातों में खोये खोये अपने परछाई के निशान ढूँढने फ़िर निकल जाते हैं सफर में,
जिन्हें लग जाए पतझड़ का शौक, कितने आए सावन और बसन्त क्या पता,
सागर के लहरों को देखो, फ़िर देखो रेत में बने अपने अरमानों का लुटने का है क्या मज़ा,
पतझड़ में खा जाता हूँ धोखा हर बार, लुट जाते देखता हूँ अपने हरेक शाखों को,
बहारों से दोस्ती या फ़िर दुश्मनी, क्या करे अफ़सोस जब होना है ये ही बागों का अंजाम,
किसने देखा है आंखों से कितनो के नीर बहते हैं रातों में, अंधेरों में रोने का है अपना ही फायदा,
किसे क्या पता बरसातों में कोई है झूमता, अरमानो के पेडों के उजड़ने पर है कोई आंसू बहाता,
रास्ते में मिले और बिछडे कितने, भीड़ में कौन किसके साथ या है कोई अकेला,
किसे है क्या फर्क पड़ता, सब अपने अन्दर और बहार के भीड़ों में खोया है गुमशुदा।

Saturday, December 20, 2008

काँच की बरनी और दो कप चाय - एक बोध कथा

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी जल्दी करने की इच्छा होती है,सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा,"काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है। दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं... उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई? हाँ... आवाज आई... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा...सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई... प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया– इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो.... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ हैं। अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी... ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है... यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है। अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक-अप करवाओ... टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो,वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे। अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये।

(अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो..मैंने अभी-अभी यही किया है )

Thursday, August 14, 2008

फ्लाई ओवर्स

एक और स्वतंत्रता दिवस,
भारत ६१ का आज,
उप्लाब्धियों पर करें हम नाज़,
सुनोगे ?
मगर है ये फेरहिस्त बहुत लम्बी,
हम हैं संसार की ढोंगी ही सही
पर प्रजातंत्र न सिर्फ़ सबसे बड़ी
पर अब हम हैं एक परमाणु शक्ति
कल तक थे उपासक शान्ति के,
अब एक राष्ट्र जो करे विश्वास शक्ति में,
बन जायेंगे बहुत जल्द सबसे बड़ी आर्थिक केन्द्र,
मत पूछो करेंगे समझौते और दोस्ती कैसे कैसे बेमेल,
बुद्ध के शांन्ति और गाँधी के अहिंसा के
सच, थक गए थे हम लिए हाथों में बोझ
फट गए जब गले हमारे
वसुधैव कुटुम्बकम का नारा लगाते लगाते
तब हमने समझा
विश्व शान्ति की परिभाषा
आ जाती है "शान्ति" स्वतः
जब करो प्रयोग
ब्रह्मास्त्र और परमाणु बम की भाषा
माना की आ जाती है शिथिलता,
विश्व शान्ति के विचारों में,
शुरू हो जाता हैं दौर
नित नए नए समझौतों के
और सिलसिले वार्तालापों के,
प्रतिस्पर्धा एक दूसरे से आगे निकलने की,
पर ये क्या?
परमाणु शक्ति नही है काफी,
अब हम करेंगे अपने को सुरक्षित
कूटनीति से
और
करेंगे हथियारों का खड़ा
एक नया जखीरा
दुनिया वालों
कह रहे हैं हम चीख चीख -
अब हम हैं परमाणु शक्ति
हमें दो UN में स्थाई सदस्यता
पर फ़िर भी कोई फर्क नही पड़ता
उकता गए थे हम
समाज को एकसमान बनाते बनाते
जब हो गए पंच वर्षीय योजनायें
बेमानी
तब हमने अपने देश में लाया
औद्योगिक क्रांति
खेतों में है क्या रखा?
भूखे पेट को फटे वस्त्रों से ढंकते ढंकते
सोशलिस्ट और ओपन मार्केट के बीच रहे सालों झूलते
तब हमने कहा-
"हम हैं एक बाज़ार
सबसे बड़े उपभोक्ता संसार के"
हमने किया बहुत प्रयास
देश निर्माण का
अब आ गया है नया जमाना
जब सब करेंगे स्वनिर्माण अपना अपना
स्वाभिमान और रोज़गार की चिंता
अब नही है प्राथमिकता
MNC की करेंगे अब हम स्वागत
ख़ुद को और स्वाभिमान को
बेचने की
अब तो लग गयी है प्रतिस्पर्धा
अगर "वसुधैव कुटुम्बकम" का है सच नारा
तो करें हम उपभोग अपने देश का
या फ़िर हो चीन और अमेरिका
संसार है एक ही परिवार ये सारा
अब कोई कृषक करे आत्महत्या
अथवा
लिए गाँधी के चरखा का भार
मरे कुटीर उद्योग भुखमरी से
क्वालिटी और प्राईस का है अब बोलबाला
स्वदेस निर्मित का मूल्य है अब बेमानी
अब हमने किया गावों की ओर कूच
नही रह सकती MNC और शहर सिमट
औद्योगीकरण और शहरीकरण के नाम पर
चाहिए फैलने के लिए जगह
पहले था भूदान
और अब ये बलिदान
अजब है गरीबी हटाने का मंत्र
दो उपजाऊ जमीने
करना असहाय कृषको को बेदखल
कौन सा है बड़ा काम?
चाहे हो वो सेंगुर या नंदी ग्राम!
गांधी के कहे भारत के हृदय को
गांवों से ला दिया शहर हमने ,
ये अलग बात है कि अब वह है कैद
शहरों की झुग्गी झोपडियों में ,
स्वावलंबी भारत बनने के सपनो को,
हमने नही है अब तक दफनाया ,
बल्कि उसे हाल पे अपने छोड़ शुरू कर दिया
उसके ऊपर नए भारत का निर्माण -
आस और मदद के टकटकी लगाये बैठे
नीचे के लोग अब नीचे ही रहेंगे
मगर शहरों के ऊंचे ऊंचे फ्लाई ओवेर्स ने ,
अब जोड़ दिए है बिज़नस सेंटर्स को,
अच्छा है,
अब मिलेगा मौका महंगी विदेशी गाडियों को,
सरपट दौड़ने का,
विचलित नही होगा मन नंगे
और बीमार भारत की तस्वीरों से,
अब दिखने लगे हैं
फ्लाई ओवेर्स के बगल लगे
बड़े बड़े विज्ञापनो के चकाचौंध होर्डिन्गस,
नयी धनाढ्य वर्ग के बढ़ते अरमानों सी
ऊंची ऊंची टावरो पर टंगे तस्वीरें,
रातों के अन्धकारो में भी जगमगाती
डकार लेती फ्लाई ओवर्स पर जाते नए भारत को
बर्गर और पिज्जा की भूख जगाती
फ्लाई ओवर्स पर दौड़ती महंगी गाडियों से भी तेज
अपनों और समाज से दूर होते
हमारी युवा पीढी
ग्रसित होती एक नयी बीमारी से
पाश्चात्य की अंधाधुंध नक़ल
उनकी मजबूरियों का परिणाम
फास्ट फ़ूड और सिंगल सोसाइटी को अपनाने की होड़
मोटी होती मानसिकताओं की तरह
और ओबीस होती पूरी नसल
और उन्ही टावरो के नीचे
भूख से दम तोड़ती
कई जिंदगियां
कुछ नव पौध जिंदगी के पहले अध्याय में ही
हार से समझौता करती
तो कुछ बीमार वृद्धावस्था में
अन्तिम पुकार के आस में बिलखती
और हाँ,
अब नही होंगी गाडियाँ गंदी,
दूर रहेंगी बहुत उन झुग्गी झोपडियो से ,
ना ही अब मरेंगे
अब फुटपाथों पर सोते मजदूर,
चलो अमीरों को मिलेगा अब आराम,
क्योंकि फ़ुटपथों पर सोने वाले किस काम के?
मर कर उनकी तो हो जाती है छुट्टी
पर कभी सोचा है की वैसे निरर्थक जीवन से ज्यादा
कितना नुक्सान कर जाता है उनकी मौत हमारे अर्थ व्यवस्था को?
कोर्ट जाते जाते,
बिज़नस मीटिंग्स कैंसल करते करते
फिल्मों की शूटिंग डेट्स को एडजस्ट करते
थक जाते थे
हमारे भविष्य निर्माता
धनाढ्य वर्ग के वारिस
और सपनों के सौदागर
क्या कहने इनके
डिस्को पब और शराब के खुमार में चूर
गाड़ियों से तेज़ इनके ख्वाब !
मगर ये जालिम फूटपाथ पर चढ़ जाती गाडियां
और सड़क पर रुक जाती थी उनकी और उनके भविष्य की ख्वाबों के दौड़
भविष्य की उम्मीद छोड़ चुके इन बेकारों का यह होता है योगदान!
भविष्य की दौड़ पर ये ब्रेक लगाने का काम करते हैं!
हटा सकते हो तो हटाओ इनको
पर
अब नही होगा ऐसा,
अब भी जायेगी गाडियां ऊपर से ही उनके
फ्लाई ओवर्स जो बन गए हैं !
गगनचुम्बी ईमारतों के बीच का सफर
अब जल्दी होगा तय ,
बिज़नस डील्स भी अब जल्दी हो पायेगा,
अमीरों को और ज्यादा अमीर होने में अब देर नही होगी,
क्या करे आज़ाद भारत ?
शहरों के बीच बने स्लम्स को कौन हटाये?
कौन बने इन मुसीबतों का कर्णधार?
इनको साथ लेकर चलना अब बस की बात नही,
इनको उखाड फेंकना बुद्धिमानी नही ,
क्यों?
इतना भी नही पता?
शहर से जीतने के लिए वोट भी तो चाहिए,
तो रहने दो गुलाबों के बीच एक कुकुरमुत्ता,
बना डालो इनके ऊपर से फ्लाई ओवेर्स,
कमाल की बात ये भी तो है की
बना दिया कई आशियाने इन फ्लाई ओवर्स के नीचे!,
सुनो !
भारत अब ६२ का है हो गया ,
अब तो भारत को अवकाश ले कर पेंशन पर जाने दो,
बुलाओ एक सभा और
एलान कर दो की भारतवासी हो गए हैं आजाद
और कर दो भारत को रिटायर !
शुरुआत हो गयी है अब इंडिया की
काश कोई फ्लाई ओवर्स होता
जो भारत और इंडिया को जोड़ पाता !



Wednesday, June 4, 2008

अनवरत

सुबह की दस्तक ,
रात की हताशा,
जिंदगी की नयी पृष्ठ
ख़ुद लिखूं या सादा ही रहने दूँ
कशमकश कोई नयी नही है
रोजमर्रा की है दास्ताँ
सालों से लिखे पृष्ठों की संकलन
रद्दी के दुकानों में तितर बितर
क्यों लिखूं
किस के लिए
कौन पढेगा
और क्या समझेगा कोई?
जिंदगी प्रश्नों के फंदे में फँसी
आशाओं की उम्मीद में
एक अनजाने दौड़ में अनवरत
न थकती है
न पूछती है
बस एक दिन रुक जाती है...

Thursday, November 15, 2007

जीवन : पुनरावृति

बहती नदी की ये धारा,
निरंतर,
अनवरत,
मानो पूछ रही
मेरे जीवन से,
क्यों बैठा है किनारे?
आ लहरों में पैठ जा,
देख मस्ती गति की
कर अनुभव उच्छ्रृंखलता की,
तीव्रता लहरों की
लौट जा
जीवन कि शैशवता में
जलाच्छादित शीतल बयार
कर रही मनो मुझ पर प्रहार
उड़ती तितलियों के साथ
स्पंदित मन खो जाती अतीत में
उन दिनों की स्मरिणकायें
निश्छल जीवन
आवारा मन
उन्मुक्त विचारें
सुनहरी कल्पनायें
फिर मद्धम होता सूरज
मन के विचारों की उड़ती तितलियाँ
दूर किसी पेड़ों की झुरमुठ में जा बैठी
आर्द्र मन के छाये में सिसकती
वो सारे कलपते अधूरे सपने
सपने अपने
अंकुरित होते ही हैं क्यों
जब मिल नही सकते इन्हें
शीतल बयारों की थपकियाँ
और मंदित धूप कि पनाह
क्यों होती हैं उड़ने की चाहत
जब पिंजरे में ही है रहना
फिर दूर कहीं कोयल की कूह्कूहाट
वापस ले आता मुझको
यथार्थ के धरातल पर
एक अनबुझी सी प्यास
मेरे अंतर्मन में
हर पल जीवन का सारांश सीमेटे
साँसों की लय पर थिरकती
मानस पटल पर नृत्य करती
स्मरण का चलचित्र चलाती
स्वप्निल अमरलता की बेल सी
मेरे अरमानों को जकड़ती
और हो चली गोधूली कि बेला
लम्बी होती जीवन की परछाई
हर इच्छायें लौटती घर को
पथिकों सी
कुछ बुझी बुझी सी
कुछ थकी थकी सी
ख़त्म हुआ जीवन का बसंत
मुरझाई पुष्प कलियों की यौवनता
अब गिरी पड़ी
सुखी सूखी सी
यथार्थ के उजड़े उपवन में
पंच तत्त्व में विलीन होती
प्रशस्त करती
नवजीवन का मार्ग
दूर क्षीतीज पर थका सूरज
यम् रागनी को दस्तक देती
और अरमानों के जुगनुयें
निकल पडी भ्रमण को
मुस्कराता चाँद
तारों की टोली के संग
बादलों से आँख मिचौली करता
अन्धकार में
आशा की उम्मीद जगाता
मचलती शीतल बयार
कल कल करती जल की धारा
चट्टानों से ठोकरें खाती
मुझसे पूछती
क्यों बैठा है किनारे
आ लहरों में पैठ जा....
किंकर्तव्य विमूढ
वरण
चरैवति चरैवति पर अवलंबित
यथावत किन्तु
एकला चलो रे के नारे पर आरोहित
अग्रसारित
गंतव्य से दूर
और दूर होता
स्वयं एवं स्वपनों से
ओझिल होता
मेरा जीवन ...

मेरी इंटरनेट पर देवनागरी मे लिपित प्रथम अभिव्यक्ति

ये मेरा सौभाग्य है कि आज मैं अपनी सबसे प्रिय भाषा हिन्दी में ब्लोग पोस्ट कर पा रहा हूँ। मैंने इसके पूर्व बहुत प्रयास किया था कि बाकी और सज्जनो के तरह मैं भी अपने विचारो कि अभिव्यक्ति अपनी भाषा में कर पाऊं , परन्तु अनेकानेक असफल प्रयासों के पश्चात् आज मेरा स्वप्न साकार हो ही गया। कहते हैं "जहाँ चाह वहाँ राह"। और दूसरी कहावत हैं न कि "अंधे को क्या चाहिऐ, दो आँखें"। बस अब मैं तो खूब लिखूंगा और खूब आनंदित होऊंगा। शायद मेरी यह स्वान्तः सुखाय की भावनाओं से लिखी मेरी आपबीतियाँ आप सबो को भी कुछ आनंद पंहुचा पाए। बस आज के लिए इतना ही...