Thursday, November 15, 2007

जीवन : पुनरावृति

बहती नदी की ये धारा,
निरंतर,
अनवरत,
मानो पूछ रही
मेरे जीवन से,
क्यों बैठा है किनारे?
आ लहरों में पैठ जा,
देख मस्ती गति की
कर अनुभव उच्छ्रृंखलता की,
तीव्रता लहरों की
लौट जा
जीवन कि शैशवता में
जलाच्छादित शीतल बयार
कर रही मनो मुझ पर प्रहार
उड़ती तितलियों के साथ
स्पंदित मन खो जाती अतीत में
उन दिनों की स्मरिणकायें
निश्छल जीवन
आवारा मन
उन्मुक्त विचारें
सुनहरी कल्पनायें
फिर मद्धम होता सूरज
मन के विचारों की उड़ती तितलियाँ
दूर किसी पेड़ों की झुरमुठ में जा बैठी
आर्द्र मन के छाये में सिसकती
वो सारे कलपते अधूरे सपने
सपने अपने
अंकुरित होते ही हैं क्यों
जब मिल नही सकते इन्हें
शीतल बयारों की थपकियाँ
और मंदित धूप कि पनाह
क्यों होती हैं उड़ने की चाहत
जब पिंजरे में ही है रहना
फिर दूर कहीं कोयल की कूह्कूहाट
वापस ले आता मुझको
यथार्थ के धरातल पर
एक अनबुझी सी प्यास
मेरे अंतर्मन में
हर पल जीवन का सारांश सीमेटे
साँसों की लय पर थिरकती
मानस पटल पर नृत्य करती
स्मरण का चलचित्र चलाती
स्वप्निल अमरलता की बेल सी
मेरे अरमानों को जकड़ती
और हो चली गोधूली कि बेला
लम्बी होती जीवन की परछाई
हर इच्छायें लौटती घर को
पथिकों सी
कुछ बुझी बुझी सी
कुछ थकी थकी सी
ख़त्म हुआ जीवन का बसंत
मुरझाई पुष्प कलियों की यौवनता
अब गिरी पड़ी
सुखी सूखी सी
यथार्थ के उजड़े उपवन में
पंच तत्त्व में विलीन होती
प्रशस्त करती
नवजीवन का मार्ग
दूर क्षीतीज पर थका सूरज
यम् रागनी को दस्तक देती
और अरमानों के जुगनुयें
निकल पडी भ्रमण को
मुस्कराता चाँद
तारों की टोली के संग
बादलों से आँख मिचौली करता
अन्धकार में
आशा की उम्मीद जगाता
मचलती शीतल बयार
कल कल करती जल की धारा
चट्टानों से ठोकरें खाती
मुझसे पूछती
क्यों बैठा है किनारे
आ लहरों में पैठ जा....
किंकर्तव्य विमूढ
वरण
चरैवति चरैवति पर अवलंबित
यथावत किन्तु
एकला चलो रे के नारे पर आरोहित
अग्रसारित
गंतव्य से दूर
और दूर होता
स्वयं एवं स्वपनों से
ओझिल होता
मेरा जीवन ...

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