Sunday, June 14, 2009

ये गर्व भरा मस्तक मेरा

ये गर्व भरा मस्तक मेरा , प्रभु चरण धूल तक झुकने दे
अंहकार विकार भरे मन को , निज नाम की माला जपने दे
मैं मन के मैल को धो न सका , ये जीवन तेरा हो न सका
मैं प्रेमी हूँ इतना न झुका, गिर भी जो पडू तो उठने दे
मैं ज्ञान की बातों में खोया , और कर्महीन पड़ कर सोया
जब आँख खुली तो मन रोया, जब सोये मुझको जगने दे
जैसा हूँ मैं खोटा या खरा, निर्दोष शरण में आ तो गया
एक बार ये कह दे खाली जा या प्रीत की रीत छलकने दे
- हरि ओउम शरण