पीले पड़ गए हैं अब सारे पत्ते, जिंदगी की धूप काफी कड़ी है,
सुबह के पले मेरे सपने, शाम के अंधेरों में जाने खो गए जैसे,
धीरे धीरे डूबती अंधेरे से नहीं, डूबते सन्नाटे के चीख से डर है,
हर गली अब सूना और रास्ते भी अब उंघती सी नज़र आते हैं,
भटका तो हूँ इसी बस्ती में, हर कोई पहचाना सा नज़र आता है ,
बदले-बदले से हैं तौर तरीके, कोई अब पहचानता भी नही है,
की थी मैंने कोशिश अरमानों के परछाई में रोशनी तलाशने की,
बरसात में भी मैंने कहीं एक आग लगाने की जो गलती की थी,
चुप रहता हूँ, पर एक लम्बी चीख कैद है कहीं अंतर्मन में,
ख़ुद को मैंने बहुत छला है और ख़ुद अपना गुनाहगार भी हूँ।
सुबह के पले मेरे सपने, शाम के अंधेरों में जाने खो गए जैसे,
धीरे धीरे डूबती अंधेरे से नहीं, डूबते सन्नाटे के चीख से डर है,
हर गली अब सूना और रास्ते भी अब उंघती सी नज़र आते हैं,
भटका तो हूँ इसी बस्ती में, हर कोई पहचाना सा नज़र आता है ,
बदले-बदले से हैं तौर तरीके, कोई अब पहचानता भी नही है,
की थी मैंने कोशिश अरमानों के परछाई में रोशनी तलाशने की,
बरसात में भी मैंने कहीं एक आग लगाने की जो गलती की थी,
चुप रहता हूँ, पर एक लम्बी चीख कैद है कहीं अंतर्मन में,
ख़ुद को मैंने बहुत छला है और ख़ुद अपना गुनाहगार भी हूँ।
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