तस्वीर सी बनी,
मेरी जिंदगी पर,
उमर की धूल पड़ गयी है,
धुंधली सी,
कहीं मेरी पहचान,
खोजने से,
कभी दिख पड़ती है,
ऐसा नहीं,
कि कोई छुआ न हो,
ये उँगलियों के निशान कहती है,
मेरे हर अरमानों ने,
गौर से परखा है,
इन को करीब से,
सदियों से रुकी घड़ी सी,
अल्बम में पडी पीली तस्वीरों सी,
यादें ,अब कहीं ठहरे पानी सी,
मानो कैद, सूखने के इंतज़ार में,
गिरते सूखे पत्तों की भी क्या मस्ती है,
पेड़ से जुदा होकर भी देखो,
हवाओं में लहराती,
न जाने कितने उमंग के साथ,
दफ़न हो जाती हैं,
पेड़ सी अब बन गयी है जिंदगी,
हर बसंत में,
नए पत्ते हरी कर देती है,
कितने पतझड़ देख ली है मैंने,
लुटता नही हूँ अब,
बस,
लुटाने का मज़ा लेता हूँ!
मेरी जिंदगी पर,
उमर की धूल पड़ गयी है,
धुंधली सी,
कहीं मेरी पहचान,
खोजने से,
कभी दिख पड़ती है,
ऐसा नहीं,
कि कोई छुआ न हो,
ये उँगलियों के निशान कहती है,
मेरे हर अरमानों ने,
गौर से परखा है,
इन को करीब से,
सदियों से रुकी घड़ी सी,
अल्बम में पडी पीली तस्वीरों सी,
यादें ,अब कहीं ठहरे पानी सी,
मानो कैद, सूखने के इंतज़ार में,
गिरते सूखे पत्तों की भी क्या मस्ती है,
पेड़ से जुदा होकर भी देखो,
हवाओं में लहराती,
न जाने कितने उमंग के साथ,
दफ़न हो जाती हैं,
पेड़ सी अब बन गयी है जिंदगी,
हर बसंत में,
नए पत्ते हरी कर देती है,
कितने पतझड़ देख ली है मैंने,
लुटता नही हूँ अब,
बस,
लुटाने का मज़ा लेता हूँ!
0 comments :
Post a Comment