Thursday, May 21, 2009

गुमशुदा

रास्ते इतने लंबे होते चले गए की उड़ने की कई बार की है मैंने कोशिश,
बादलों के पार कहीं छुपी होगी मेरी मंजिल बारिश का इंतज़ार है अभी,
दिन के उजालों ने मुझे उलझाये रखा अपनी ही परछाइयों में ओझल,
रातों के अंधेरे में चांदनी के नशे में खोकर जुगनुओं को पकड़ने की है चाहत,
दिन भर देखते रहे अपनी ही परछाई को लम्बी होते दूर तक कहीं जाते,
रातों में खोये खोये अपने परछाई के निशान ढूँढने फ़िर निकल जाते हैं सफर में,
जिन्हें लग जाए पतझड़ का शौक, कितने आए सावन और बसन्त क्या पता,
सागर के लहरों को देखो, फ़िर देखो रेत में बने अपने अरमानों का लुटने का है क्या मज़ा,
पतझड़ में खा जाता हूँ धोखा हर बार, लुट जाते देखता हूँ अपने हरेक शाखों को,
बहारों से दोस्ती या फ़िर दुश्मनी, क्या करे अफ़सोस जब होना है ये ही बागों का अंजाम,
किसने देखा है आंखों से कितनो के नीर बहते हैं रातों में, अंधेरों में रोने का है अपना ही फायदा,
किसे क्या पता बरसातों में कोई है झूमता, अरमानो के पेडों के उजड़ने पर है कोई आंसू बहाता,
रास्ते में मिले और बिछडे कितने, भीड़ में कौन किसके साथ या है कोई अकेला,
किसे है क्या फर्क पड़ता, सब अपने अन्दर और बहार के भीड़ों में खोया है गुमशुदा।

1 comments :

Unknown said...

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Love Shayari