Monday, August 8, 2011

यथा-स्थिति

वही धूप,
वही पानी,
कोई चन्दन,
तो कोई नीम,
जैसी जिसकी नियति,
वैसी ही उसने पाई...
प्रयास की अपनी सीमा है,
आमूल परिवर्तन की आस मिथ्या है,
जिस शकल में हो,
उसी में प्रसन्न रहो...

गुब्बारों का खेल

वो आया था कई सालों पहले,
कोई था एक सपनों का सौदागर,
कई सारे दे गया था मुझे अरमानों के रंगीन गुब्बारे,
मैं नादान उनसे बहुत खेला,
बहुत बार मेरे निश्चल मन को सबने गुदगुदाया,
फिर कुछ गुब्बारे फुट गए,
और कुछ को लोगों ने मुझसे छीन लिए,
जो कुछ बचे थे वो सारे एक एक कर,
मेरे हाथों से छुट गए और मुझसे बिछड़ते,
दूर आसमान में तेजी से मुझसे और दूर जाते,
मुझसे मानो अलविदा कहता,
और मैं कैसा नादान,
अब उन बादलों और धूप के खेलों में खोया,
बस हाथ में आये और खो गए सारे गुब्बारों के बारे में सोचता,
कभी गर्वित,
कभी व्यथित,
कभी चकित,
सोचता हूँ की आगे की न जाने,
बचपन तो मेरी बहुत रंगीन थी...



मार्गदर्शन

तीव्र चाल,
फिर दौड़,
नया जोश,
ढेर सारी उमंग,
हल्की सी थकान,
पुनः उत्साह,
मंद चाल,
फिर थकान,
ठोकरें,
अवरोध,
प्रयास,
असमर्थता,
क्षणिक विश्राम,
पुनः प्रयास,
विफलता,
अनगिनित प्रयास,
अनगिनत हार,
बढ़ती व्यस्तता,
और साथ साथ व्यग्रता,
बढ़ती जिम्मेदारियों की ठण्ड,
कम होती उम्र की रजाई,
फिर,
सामंजस्य,
स्व-अनुरूप चाल,
एकरसता,
उड़ते अरमानों के बादल के तले,
लम्बी जीवन के पगडंडी पर,
यथार्थ के कड़े धूप को सहते,
नियति के नियंत्रण में,
मैं अब निशब्द,
चला जा रहा हूँ,
किसी अनजाने गंतव्य की ओर...
अनचाही, अनजानी, अनकही, अपराध-बोध से ग्रसित,
कोई अपरिचित सा मार्गदर्शन...