वो आया था कई सालों पहले,
कोई था एक सपनों का सौदागर,
कई सारे दे गया था मुझे अरमानों के रंगीन गुब्बारे,
मैं नादान उनसे बहुत खेला,
बहुत बार मेरे निश्चल मन को सबने गुदगुदाया,
फिर कुछ गुब्बारे फुट गए,
और कुछ को लोगों ने मुझसे छीन लिए,
जो कुछ बचे थे वो सारे एक एक कर,
मेरे हाथों से छुट गए और मुझसे बिछड़ते,
दूर आसमान में तेजी से मुझसे और दूर जाते,
मुझसे मानो अलविदा कहता,
और मैं कैसा नादान,
अब उन बादलों और धूप के खेलों में खोया,
बस हाथ में आये और खो गए सारे गुब्बारों के बारे में सोचता,
कभी गर्वित,
कभी व्यथित,
कभी चकित,
सोचता हूँ की आगे की न जाने,
बचपन तो मेरी बहुत रंगीन थी...
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