Saturday, October 31, 2009

हौसला

तस्वीर सी बनी,
मेरी जिंदगी पर,
उमर की धूल पड़ गयी है,
धुंधली सी,
कहीं मेरी पहचान,
खोजने से,
कभी दिख पड़ती है,
ऐसा नहीं,
कि कोई छुआ न हो,
ये उँगलियों के निशान कहती है,
मेरे हर अरमानों ने,
गौर से परखा है,
इन को करीब से,
सदियों से रुकी घड़ी सी,
अल्बम में पडी पीली तस्वीरों सी,
यादें ,अब कहीं ठहरे पानी सी,
मानो कैद, सूखने के इंतज़ार में,
गिरते सूखे पत्तों की भी क्या मस्ती है,
पेड़ से जुदा होकर भी देखो,
हवाओं में लहराती,
न जाने कितने उमंग के साथ,
दफ़न हो जाती हैं,
पेड़ सी अब बन गयी है जिंदगी,
हर बसंत में,
नए पत्ते हरी कर देती है,
कितने पतझड़ देख ली है मैंने,
लुटता नही हूँ अब,
बस,
लुटाने का मज़ा लेता हूँ!

Saturday, October 17, 2009

आपस की बात

"ये तो मैंने बहुत पहले सोच लिया था जो तुम आज कह रहे हो। अब तो काफी देर हो गया है, खैर कोशिश कर के देख लो।"
मैं उसकी बातें सुन कर सोचने पर विवश हो गया की जिन्दगी इतनी क्रूर क्यों होती है कि मैं हर बार इतने देर से जागता हूँ? जिधर देखता हूँ हर कोई किसी न किसी मुकाम पर हैं, एक मैं ही छूट सा गया हूँ जैसे। इधर जब मैं किसी और से मुखातिब होता हूँ तो वो कहता है - " मैंने तो ज्यादा सोचा ही नहीं बस सब ख़ुद ही होता चला गया।"
प्रयास और निष्क्रियता के बीच मैंने तो बहुत उछल कूद मारी और हासिल तो बस इतना ही हुआ कि आज मैंने जहाँ से शुरू कि थी उसके आस पास ही खड़ा हूँ।
बजाय इसके कि मैं दूसरो को देखूं, मैं ज्यादा दुखी ख़ुद के क्षमता के अनुरूप अपने सफलता को न देख कर हो जाता हूँ। सफल न होना और असफल होने में ज्यादा फर्क नही है पर बहुत फासला है। मेरे हर प्रयास का फल नाकामी रहा, भाग्य को दोष देना सबसे बड़ी बेवकूफी होगी। मेरे भाग्य अच्छे है तभी मैं इनका आकलन कर पा रहा हूँ। मैंने जीवन में हर तरह के उतर चढाव देखे, पर अपने परिवार के साथ बहुत प्रसन्न रहा हूँ , ये मेरे अच्छे भाग्य नहीं तो और क्या है? मैं जब कभी बहुत ज्यादा फिसलने लगा, कहीं न कहीं मुझे एक सहारा मिल गया। पर अन्दर कहीं एक कसक है कि सभी ने अपनी मंजिल हासिल कि, तो फ़िर मैं क्यूँ छूट गया? बच्चों कि तरह सिर्फ़ शिकायत नहीं पर एक स्ववालोकन का विषय है। मैं नहीं कहता कि मुझे वह होना ही चाहिए था, कुछ न कुछ कारण होंगे, पर आखिर वो पता चले जो मेरे वहां तक पहुँचने में अवरोधक हैं। उम्र के बढ़ने के साथ मेरे आवश्यकताएं और उनकी प्राथमिकताएं बदल रहीं हैं, पर इन बदलावों में स्वयं को ढालने की कोशिश चलती ही रहती हैं। कहीं न कहीं ये डर मन में जरुर समां गया है कि शायद अपने अरमानों के साथ मुझे समझौता करना ही पड़ेगा। अब थक गया हूँ और जरा सा वक्त लगेगा स्वयं को समझाने में कि अब ये ही यथार्थ है। सपने भी कितने अजीब होते हैं, आता है बिना रोक टोक के, जब उनको दफनाना होता है, तो कितना दुःख होता है! सपने शायद अरमानों में अमरबेल कि तरह लिपट गए थे और पेड़ के उन हर शाखाओं को काटना शायद घर में धुप आने देने के लिए अब नितांत आवश्यक हो गया है। दुःख होगा, पर अंधेरे में रहने से ज्यादा अच्छा कुल्हाडी उठाना होगा। यथार्थ के कड़वी घूंट पीने के बाद ही मज़ा देता है। जब तक न पियो सपनों कि बीमारी लगी रहती है, यथार्थ के घूंट औषधि का काम करता है। विकल्पों के तलाश जारी है, जिन विचारों पर पहले कभी ध्यान भी नही दिया करते थी आज उन पर गौर करने के पूर्व फूंक फूंक कर आगे बढ़ना पड़ रहा है। ताने और समीक्षाओं का बाज़ार गरम है, वाजीब है, दुकाने बड़ी बड़ी जब बन गए थे तो उसके होल्डिंग्स उतारते वक्त हर कोई बहुत सारे प्रश्न करेंगे। खामोश रहना निरुत्तर होने का समर्थन करता नज़र आता है, व्याख्या करना अपने अरमानों का गला घोंट यथार्थ से समझौता करता एक मजबूर या आसमान में गूंजता और गरजता युद्ध्पोतक विमान के चक्कर काटते जमीन पर गिरने सा बोध करता है। ख़ुद का सामना करते डर लगता है। मैंने स्वयं के लिए जो एक सपने देखे थे उनसे कोसों दूर पता नहीं किस अनजाने से गलियों में भटकता और अचानक से कहीं एक अजनबी से घर में रहने का सोच लिया है, मानो ऐसा लगता है। बहुत सोचने का समय नही है न ही समीक्षा का वक्त है, जीवन पहले संघर्ष था, अब एक युद्ध सा हो गया है। जरा सी चूक और पराजय ...!
ख़ुद से अब तक घृणा तो नही हुआ है पर देर तक घर पर रहे अतिथि की तरह, अपनापन से फिसलते कड़वाहट का सा बोध हो रहा है। पुराने संकल्प टूटे हैं, पर उनके चिता से नए बने जरुर हैं, बहुत अपमानित सा अनुभव करता हूँ, और हर मेरे आंसुओ से सींचे नए संकल्प मुझे सफल होने के लिए ज्यादा प्रेरित करते रहते हैं।




साथ साथ

देखा है तुम्हें कई बार करीब से, छूकर महसूस भी किया है,
तितलियों जैसे उड़ जाते हो, पकड़ने की जब भी की कोशिश,
ऐसा नहीं कि तुम्हें मैं जानता भी नहीं मेरे अजनबी दोस्त,
साथ बरसों चले हो, तेरे हर आदतों से मैं हो गया हूँ वाकिफ,
मचल जाता था पहले मैं हर उन जुगनुओं को पकड़ने को,
तारों के गलियों में चलते जाने कितने बार गया हूँ अब फिसल,
आदत सी हो गयी है ख़ुद से और खामोशी से बातें करने की,
उकता गया है मन अब नही है कोई और मिलने की ख्वाहिश,
थक गया हूँ अब चलते चलते उठाये इन अरमानों के बोझ को,
बस यहीं कहीं बैठ जाऊं, उम्र तो कर ली मैंने तमाम हासिल।

Sunday, October 11, 2009

यात्रा

पीले पड़ गए हैं अब सारे पत्ते, जिंदगी की धूप काफी कड़ी है,
सुबह के पले मेरे सपने, शाम के अंधेरों में जाने खो गए जैसे,
धीरे धीरे डूबती अंधेरे से नहीं, डूबते सन्नाटे के चीख से डर है,
हर गली अब सूना और रास्ते भी अब उंघती सी नज़र आते हैं,
भटका तो हूँ इसी बस्ती में, हर कोई पहचाना सा नज़र आता है ,
बदले-बदले से हैं तौर तरीके, कोई अब पहचानता भी नही है,
की थी मैंने कोशिश अरमानों के परछाई में रोशनी तलाशने की,
बरसात में भी मैंने कहीं एक आग लगाने की जो गलती की थी,
चुप रहता हूँ, पर एक लम्बी चीख कैद है कहीं अंतर्मन में,
ख़ुद को मैंने बहुत छला है और ख़ुद अपना गुनाहगार भी हूँ।

Saturday, October 10, 2009

मंजिल नहीं रास्ते से प्यार है

अपनों के भीड़ में किसी अजनबी से दोस्ती की है,
खाए हैं इतने चोट की अब जख्मों से प्यार है,
टूटे हैं ख्वाब हर बार मेरे शीशों की तरह,
हकीकत कड़वी ही सही, अब उसी से प्यार है,
पाने की हर कोशिश जब हो गए नाकाम मेरे,
मंजिल नामुमकिन तो अब रास्तों से प्यार है,
हालातों के थपेडों ने कर दिया है मजबूर मुझे,
जो कुछ भी की है हासिल, अब उन्ही से प्यार है,
खुल के कहने की कई बार की मैंने कोशिश,
अब कोई न सुने तो अब खामोशी से ही प्यार है,
पाने को कई बार मचल पड़ा था मन मेरा,
अब आंखों से ओझल, इतनी दूर पर तब भी प्यार है,
हर गम के घूंट पीने के बाद हैं मैंने ये जाना,
तू मिले या न सही, हर कोशिश से मुझे प्यार है।