सुबह की दस्तक ,
रात की हताशा,
जिंदगी की नयी पृष्ठ
ख़ुद लिखूं या सादा ही रहने दूँ
कशमकश कोई नयी नही है
रोजमर्रा की है दास्ताँ
सालों से लिखे पृष्ठों की संकलन
रद्दी के दुकानों में तितर बितर
क्यों लिखूं
किस के लिए
कौन पढेगा
और क्या समझेगा कोई?
जिंदगी प्रश्नों के फंदे में फँसी
आशाओं की उम्मीद में
एक अनजाने दौड़ में अनवरत
न थकती है
न पूछती है
बस एक दिन रुक जाती है...
रात की हताशा,
जिंदगी की नयी पृष्ठ
ख़ुद लिखूं या सादा ही रहने दूँ
कशमकश कोई नयी नही है
रोजमर्रा की है दास्ताँ
सालों से लिखे पृष्ठों की संकलन
रद्दी के दुकानों में तितर बितर
क्यों लिखूं
किस के लिए
कौन पढेगा
और क्या समझेगा कोई?
जिंदगी प्रश्नों के फंदे में फँसी
आशाओं की उम्मीद में
एक अनजाने दौड़ में अनवरत
न थकती है
न पूछती है
बस एक दिन रुक जाती है...
1 comments :
आप अच्छा लिख रहे हैं, और भी अच्छा लिखें, शुभकामनायें.
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उल्टा तीर
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