Thursday, August 14, 2008

फ्लाई ओवर्स

एक और स्वतंत्रता दिवस,
भारत ६१ का आज,
उप्लाब्धियों पर करें हम नाज़,
सुनोगे ?
मगर है ये फेरहिस्त बहुत लम्बी,
हम हैं संसार की ढोंगी ही सही
पर प्रजातंत्र न सिर्फ़ सबसे बड़ी
पर अब हम हैं एक परमाणु शक्ति
कल तक थे उपासक शान्ति के,
अब एक राष्ट्र जो करे विश्वास शक्ति में,
बन जायेंगे बहुत जल्द सबसे बड़ी आर्थिक केन्द्र,
मत पूछो करेंगे समझौते और दोस्ती कैसे कैसे बेमेल,
बुद्ध के शांन्ति और गाँधी के अहिंसा के
सच, थक गए थे हम लिए हाथों में बोझ
फट गए जब गले हमारे
वसुधैव कुटुम्बकम का नारा लगाते लगाते
तब हमने समझा
विश्व शान्ति की परिभाषा
आ जाती है "शान्ति" स्वतः
जब करो प्रयोग
ब्रह्मास्त्र और परमाणु बम की भाषा
माना की आ जाती है शिथिलता,
विश्व शान्ति के विचारों में,
शुरू हो जाता हैं दौर
नित नए नए समझौतों के
और सिलसिले वार्तालापों के,
प्रतिस्पर्धा एक दूसरे से आगे निकलने की,
पर ये क्या?
परमाणु शक्ति नही है काफी,
अब हम करेंगे अपने को सुरक्षित
कूटनीति से
और
करेंगे हथियारों का खड़ा
एक नया जखीरा
दुनिया वालों
कह रहे हैं हम चीख चीख -
अब हम हैं परमाणु शक्ति
हमें दो UN में स्थाई सदस्यता
पर फ़िर भी कोई फर्क नही पड़ता
उकता गए थे हम
समाज को एकसमान बनाते बनाते
जब हो गए पंच वर्षीय योजनायें
बेमानी
तब हमने अपने देश में लाया
औद्योगिक क्रांति
खेतों में है क्या रखा?
भूखे पेट को फटे वस्त्रों से ढंकते ढंकते
सोशलिस्ट और ओपन मार्केट के बीच रहे सालों झूलते
तब हमने कहा-
"हम हैं एक बाज़ार
सबसे बड़े उपभोक्ता संसार के"
हमने किया बहुत प्रयास
देश निर्माण का
अब आ गया है नया जमाना
जब सब करेंगे स्वनिर्माण अपना अपना
स्वाभिमान और रोज़गार की चिंता
अब नही है प्राथमिकता
MNC की करेंगे अब हम स्वागत
ख़ुद को और स्वाभिमान को
बेचने की
अब तो लग गयी है प्रतिस्पर्धा
अगर "वसुधैव कुटुम्बकम" का है सच नारा
तो करें हम उपभोग अपने देश का
या फ़िर हो चीन और अमेरिका
संसार है एक ही परिवार ये सारा
अब कोई कृषक करे आत्महत्या
अथवा
लिए गाँधी के चरखा का भार
मरे कुटीर उद्योग भुखमरी से
क्वालिटी और प्राईस का है अब बोलबाला
स्वदेस निर्मित का मूल्य है अब बेमानी
अब हमने किया गावों की ओर कूच
नही रह सकती MNC और शहर सिमट
औद्योगीकरण और शहरीकरण के नाम पर
चाहिए फैलने के लिए जगह
पहले था भूदान
और अब ये बलिदान
अजब है गरीबी हटाने का मंत्र
दो उपजाऊ जमीने
करना असहाय कृषको को बेदखल
कौन सा है बड़ा काम?
चाहे हो वो सेंगुर या नंदी ग्राम!
गांधी के कहे भारत के हृदय को
गांवों से ला दिया शहर हमने ,
ये अलग बात है कि अब वह है कैद
शहरों की झुग्गी झोपडियों में ,
स्वावलंबी भारत बनने के सपनो को,
हमने नही है अब तक दफनाया ,
बल्कि उसे हाल पे अपने छोड़ शुरू कर दिया
उसके ऊपर नए भारत का निर्माण -
आस और मदद के टकटकी लगाये बैठे
नीचे के लोग अब नीचे ही रहेंगे
मगर शहरों के ऊंचे ऊंचे फ्लाई ओवेर्स ने ,
अब जोड़ दिए है बिज़नस सेंटर्स को,
अच्छा है,
अब मिलेगा मौका महंगी विदेशी गाडियों को,
सरपट दौड़ने का,
विचलित नही होगा मन नंगे
और बीमार भारत की तस्वीरों से,
अब दिखने लगे हैं
फ्लाई ओवेर्स के बगल लगे
बड़े बड़े विज्ञापनो के चकाचौंध होर्डिन्गस,
नयी धनाढ्य वर्ग के बढ़ते अरमानों सी
ऊंची ऊंची टावरो पर टंगे तस्वीरें,
रातों के अन्धकारो में भी जगमगाती
डकार लेती फ्लाई ओवर्स पर जाते नए भारत को
बर्गर और पिज्जा की भूख जगाती
फ्लाई ओवर्स पर दौड़ती महंगी गाडियों से भी तेज
अपनों और समाज से दूर होते
हमारी युवा पीढी
ग्रसित होती एक नयी बीमारी से
पाश्चात्य की अंधाधुंध नक़ल
उनकी मजबूरियों का परिणाम
फास्ट फ़ूड और सिंगल सोसाइटी को अपनाने की होड़
मोटी होती मानसिकताओं की तरह
और ओबीस होती पूरी नसल
और उन्ही टावरो के नीचे
भूख से दम तोड़ती
कई जिंदगियां
कुछ नव पौध जिंदगी के पहले अध्याय में ही
हार से समझौता करती
तो कुछ बीमार वृद्धावस्था में
अन्तिम पुकार के आस में बिलखती
और हाँ,
अब नही होंगी गाडियाँ गंदी,
दूर रहेंगी बहुत उन झुग्गी झोपडियो से ,
ना ही अब मरेंगे
अब फुटपाथों पर सोते मजदूर,
चलो अमीरों को मिलेगा अब आराम,
क्योंकि फ़ुटपथों पर सोने वाले किस काम के?
मर कर उनकी तो हो जाती है छुट्टी
पर कभी सोचा है की वैसे निरर्थक जीवन से ज्यादा
कितना नुक्सान कर जाता है उनकी मौत हमारे अर्थ व्यवस्था को?
कोर्ट जाते जाते,
बिज़नस मीटिंग्स कैंसल करते करते
फिल्मों की शूटिंग डेट्स को एडजस्ट करते
थक जाते थे
हमारे भविष्य निर्माता
धनाढ्य वर्ग के वारिस
और सपनों के सौदागर
क्या कहने इनके
डिस्को पब और शराब के खुमार में चूर
गाड़ियों से तेज़ इनके ख्वाब !
मगर ये जालिम फूटपाथ पर चढ़ जाती गाडियां
और सड़क पर रुक जाती थी उनकी और उनके भविष्य की ख्वाबों के दौड़
भविष्य की उम्मीद छोड़ चुके इन बेकारों का यह होता है योगदान!
भविष्य की दौड़ पर ये ब्रेक लगाने का काम करते हैं!
हटा सकते हो तो हटाओ इनको
पर
अब नही होगा ऐसा,
अब भी जायेगी गाडियां ऊपर से ही उनके
फ्लाई ओवर्स जो बन गए हैं !
गगनचुम्बी ईमारतों के बीच का सफर
अब जल्दी होगा तय ,
बिज़नस डील्स भी अब जल्दी हो पायेगा,
अमीरों को और ज्यादा अमीर होने में अब देर नही होगी,
क्या करे आज़ाद भारत ?
शहरों के बीच बने स्लम्स को कौन हटाये?
कौन बने इन मुसीबतों का कर्णधार?
इनको साथ लेकर चलना अब बस की बात नही,
इनको उखाड फेंकना बुद्धिमानी नही ,
क्यों?
इतना भी नही पता?
शहर से जीतने के लिए वोट भी तो चाहिए,
तो रहने दो गुलाबों के बीच एक कुकुरमुत्ता,
बना डालो इनके ऊपर से फ्लाई ओवेर्स,
कमाल की बात ये भी तो है की
बना दिया कई आशियाने इन फ्लाई ओवर्स के नीचे!,
सुनो !
भारत अब ६२ का है हो गया ,
अब तो भारत को अवकाश ले कर पेंशन पर जाने दो,
बुलाओ एक सभा और
एलान कर दो की भारतवासी हो गए हैं आजाद
और कर दो भारत को रिटायर !
शुरुआत हो गयी है अब इंडिया की
काश कोई फ्लाई ओवर्स होता
जो भारत और इंडिया को जोड़ पाता !



Wednesday, June 4, 2008

अनवरत

सुबह की दस्तक ,
रात की हताशा,
जिंदगी की नयी पृष्ठ
ख़ुद लिखूं या सादा ही रहने दूँ
कशमकश कोई नयी नही है
रोजमर्रा की है दास्ताँ
सालों से लिखे पृष्ठों की संकलन
रद्दी के दुकानों में तितर बितर
क्यों लिखूं
किस के लिए
कौन पढेगा
और क्या समझेगा कोई?
जिंदगी प्रश्नों के फंदे में फँसी
आशाओं की उम्मीद में
एक अनजाने दौड़ में अनवरत
न थकती है
न पूछती है
बस एक दिन रुक जाती है...

Thursday, November 15, 2007

जीवन : पुनरावृति

बहती नदी की ये धारा,
निरंतर,
अनवरत,
मानो पूछ रही
मेरे जीवन से,
क्यों बैठा है किनारे?
आ लहरों में पैठ जा,
देख मस्ती गति की
कर अनुभव उच्छ्रृंखलता की,
तीव्रता लहरों की
लौट जा
जीवन कि शैशवता में
जलाच्छादित शीतल बयार
कर रही मनो मुझ पर प्रहार
उड़ती तितलियों के साथ
स्पंदित मन खो जाती अतीत में
उन दिनों की स्मरिणकायें
निश्छल जीवन
आवारा मन
उन्मुक्त विचारें
सुनहरी कल्पनायें
फिर मद्धम होता सूरज
मन के विचारों की उड़ती तितलियाँ
दूर किसी पेड़ों की झुरमुठ में जा बैठी
आर्द्र मन के छाये में सिसकती
वो सारे कलपते अधूरे सपने
सपने अपने
अंकुरित होते ही हैं क्यों
जब मिल नही सकते इन्हें
शीतल बयारों की थपकियाँ
और मंदित धूप कि पनाह
क्यों होती हैं उड़ने की चाहत
जब पिंजरे में ही है रहना
फिर दूर कहीं कोयल की कूह्कूहाट
वापस ले आता मुझको
यथार्थ के धरातल पर
एक अनबुझी सी प्यास
मेरे अंतर्मन में
हर पल जीवन का सारांश सीमेटे
साँसों की लय पर थिरकती
मानस पटल पर नृत्य करती
स्मरण का चलचित्र चलाती
स्वप्निल अमरलता की बेल सी
मेरे अरमानों को जकड़ती
और हो चली गोधूली कि बेला
लम्बी होती जीवन की परछाई
हर इच्छायें लौटती घर को
पथिकों सी
कुछ बुझी बुझी सी
कुछ थकी थकी सी
ख़त्म हुआ जीवन का बसंत
मुरझाई पुष्प कलियों की यौवनता
अब गिरी पड़ी
सुखी सूखी सी
यथार्थ के उजड़े उपवन में
पंच तत्त्व में विलीन होती
प्रशस्त करती
नवजीवन का मार्ग
दूर क्षीतीज पर थका सूरज
यम् रागनी को दस्तक देती
और अरमानों के जुगनुयें
निकल पडी भ्रमण को
मुस्कराता चाँद
तारों की टोली के संग
बादलों से आँख मिचौली करता
अन्धकार में
आशा की उम्मीद जगाता
मचलती शीतल बयार
कल कल करती जल की धारा
चट्टानों से ठोकरें खाती
मुझसे पूछती
क्यों बैठा है किनारे
आ लहरों में पैठ जा....
किंकर्तव्य विमूढ
वरण
चरैवति चरैवति पर अवलंबित
यथावत किन्तु
एकला चलो रे के नारे पर आरोहित
अग्रसारित
गंतव्य से दूर
और दूर होता
स्वयं एवं स्वपनों से
ओझिल होता
मेरा जीवन ...

मेरी इंटरनेट पर देवनागरी मे लिपित प्रथम अभिव्यक्ति

ये मेरा सौभाग्य है कि आज मैं अपनी सबसे प्रिय भाषा हिन्दी में ब्लोग पोस्ट कर पा रहा हूँ। मैंने इसके पूर्व बहुत प्रयास किया था कि बाकी और सज्जनो के तरह मैं भी अपने विचारो कि अभिव्यक्ति अपनी भाषा में कर पाऊं , परन्तु अनेकानेक असफल प्रयासों के पश्चात् आज मेरा स्वप्न साकार हो ही गया। कहते हैं "जहाँ चाह वहाँ राह"। और दूसरी कहावत हैं न कि "अंधे को क्या चाहिऐ, दो आँखें"। बस अब मैं तो खूब लिखूंगा और खूब आनंदित होऊंगा। शायद मेरी यह स्वान्तः सुखाय की भावनाओं से लिखी मेरी आपबीतियाँ आप सबो को भी कुछ आनंद पंहुचा पाए। बस आज के लिए इतना ही...